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मुस्कुराने की वजह ना ढूंढे ...

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मुस्कुराने की वजह ना ढूंढे ...।          कई बार देखने मे आता है कि व्यक्ति अपने जीवन मे कभी मुस्कुराया ही नही, पता नही वो कब मुस्कुराया होगा, कहते है उसे दुःख है, कोई कहता है उसका स्वभाव ही ऐसा है, कोई कहता है उसके पास मुस्कुराने की वजह नही है, आदि।         क्या मुस्कुराने का संबंध दुःख से है ? क्या मुस्कुराने की भी कोई वजह होती होगी ? क्या मुस्कुराने का भी स्वभाव होता है ? शायद इन सभी सवालों का जबाब ना होगा।         मुस्कुराने का संबंध जीवन की नीरसता से है, नकारात्मक सोच से है। दुःख का संबंध तो मन व शरीर से होता है। जबकि मुस्कुराहट और आनंद तो अन्तरात्मा से होता है ये आत्मा का विषय है। यदि हम स्वयं सच्चे अर्थों में मानव बन जाएँ तो जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आएँगी ही नहीं। यदि हम कभी एकांत में शांतचित्त बैठकर चिंतन और मनन करें तो जीवन का लक्ष्य स्पष्ट रूप से सामने दिखाई देगा। अगर हम खुद से प्रेम  करे और औरों में प्रेम बांटे तो आनंद की अनुभूति होगी, मन प्रसन्न होगा, और फिर मुस्कुराने से कोई रोक भी नही पायेगा। फिर ये...

ज्ञान और घमंड

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जिन्हें ज्ञान है उन्हें  घमंड कैसा.. जिन्हें घमंड  है उन्हें ज्ञान कैसा .. ज्ञान और घमंड एक ही सिक्के के दो पहलू है। यदा कदा अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान पर घमंड हो सकता है, लेकिन ज्ञानी (सर्वज्ञ) को घमंड  नही हो सकता। सर्वज्ञ ज्ञान के प्रकाश से घमंड का सर्वथा नाश हो जाता है। इसीलिए कहते है "जिन्हें ज्ञान है, उन्हें घमंड कैसा ..। और जिन्हें घमंड है, उन्हें ज्ञान कैसा ..। अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का घमंड तो होता है, लेकिन घमंड का ज्ञान कभी नही होता। जिस व्यक्ति को अपने घमंड का ज्ञान-भान ना हो वह ज्ञानी हो ही नही सकता, वह अल्पज्ञानी है। कई बार देखा जाता है कि अपने आप को ज्ञानी समझने वाले (अल्पज्ञानी)  इतना बोलते है कि सुनने वाले उस ज्ञानी के चुप होने का इंतजार करते है, और सर्वज्ञ ज्ञानी व्यक्ति सिर्फ इतना बोलते है कि सुनने वाले और कुछ सुनने का इंतजार करते रहते है।  

उपस्थिति नही, उपस्थित रहे !

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उपस्तिथि नही उपस्थित रहे दोस्तो, हम अक्सर अपनो के साथ उपस्थित होते है, मांगलिक सुअवसरों पर परिजनों, स्वजनों के साथ समारोह में उपस्थित होते है, हम कक्षा में उपस्थित रहते है, इस प्रकार के और भी कई उदाहरण हो सकते है। देखने मे आता है कि लोग, स्वजन, विद्यार्थी आदि उस जगह शारीरिक रूप से उपस्थित तो होते है, लेकिन मानसिक रूप से अनुपस्थित रहते है, यह स्तिथि ठीक नही है। हम जहाँ भी हो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से उपस्थित रहे। वो चाहे मांगलिक आयोजन हो, कक्षा हो या कोई भी समारोह आदि। हमे चाहिए कि हम सुख या दुःख दोनों ही परिस्थिति में शारीरिक और मानसिक रूप से उपस्थित रहे।

सुप्रभात

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सुप्रभात

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अनुमान व अनुभव

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अनुमान व अनुभव            प्रायः हम अनुमान लगा कर किसी कार्य का श्रीगणेश कर देते है, लेकिन वो कार्य सही दिशा में होगा या नही, मनवांछित फल प्राप्त होंगे या नही, यह संदेह में होता है, क्योकि वो सिर्फ अनुमान से लिया गया निर्णय था। " अनुमान " कल्पना व भाव से आता है।           जब कभी अनुभव के आधार पर किसी कार्य का प्रारम्भ किया जाता है, तो यह तय हो जाता है कि कार्यसिद्ध होगा ही, क्योंकि कार्य अनुभव के आधार पर किया गया था, और "अनुभव" प्रयोग व परीक्षा के बाद ही आता है।           अतःएव कोई भी प्लानिग या किसी कार्य का शुभारंभ "अनुमान" के आधार पर ना करके "अनुभव" के आधार पर करना बेहतर होगा। यहाँ पर बात ये आएगी की पहले-पहल अनुभव कैसे आएगा जब तक कि कोई प्रयोग ना किये जावे। इसीलिये हमे अनुभवीयो के "अनुभव" से कार्य संपादित करना चाहिए। अनुभवी लोगो के अनुभव का लाभ उठाना चाहिए ।

जीवन ही परीक्षा है और जीवन ही परीक्षाफल

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 परीक्षा और परीक्षाफल दोस्तो परीक्षा का नाम सुनकर सबके जेहन में अपना बचपन और उससे जुड़ी बातें बरबस ही याद आने  लगती है.., और फिर ये स्वाभाविक मानवीय स्वभाव का हिस्सा है। हम धीरे-धीरे जैसे वर्तमान से भूतकाल की और जाते है तो वो लड़कपन की बातें, वो दोस्तो के साथ खेले खेलकूद, वो शरारत, वो डांट-फटकार आदि .... याद कर बरबस चेहरे पर सुकून देने वाली हँसी से मन परम आनंदित हो उठता है। लेकिन आज हम सिर्फ उस परीक्षा की बात नही कह रहे जो कभी अध्ययन काल मे दिया करते थे, हम आज बात कर रहे है, जीवन के हर मोड़ पर दे रहे परीक्षा की जिसका फल (परीक्षाफल) पता नही कब प्राप्त होगा, प्राप्त होगा भी या नही, फल प्रत्यक्ष प्राप्त होगा या अप्रत्यक्ष ये भी पता नही, फल हमे प्राप्त होगा या किसी और को ये ज्ञात नही, खैर ....। एक बात तो तय है जिसने अध्ययन के साथ जीवन के मूलमंत्र भी सीखे व जाने है, वे लोग दोनों ही परीक्षा में सफल होते देखे जा सकते है। सफलता का सीधा-सीधा मतलब ये भी नही है की आप पढ़े-लिखे है या अनपढ़ है। दूसरे शब्दों में कहे तो सफलता  स्कूली शिक्षा की मोहताज नही, इसका मतलब ये भी नही की ह...

हम चींटियों से भी सिख ले....

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  ये चीटियां भी कमाल होती है। इन नन्हे जीव से भी हम बहुत कुछ सीख सकते है, जैसे अनुशासन, दूरदर्शिता और सकरात्मता। चीटियां हमेशा अनुशासित हो कर एक लाइन में चलती है। किसी के रोके रुकती नही है, वे अवरोध को छोड़ नया रास्ता बनाती है। दूरदर्शी सोच के तहत खाने का संग्रहण करती है एवं सकरात्मता के तहत उचित मौसम में बाहर निकलने का इंतजार करती है। कम से कम हम इन नन्हे से जीव से सिख ले और अपनों के साथ अपनत्व बनाये रखे, मिठास युक्त संबंध बनाए, परिवार, समाज व देश के प्रति सकारात्मक सोच रखे।

Motivational Quotes

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भाषा या संकेत भावनाओ को प्रकट करने का माध्यम होता है। भाषा या संकेतकों को  किसी दूसरी पद्धति से बता सकते है, लेेकिन भावनाओ को  भावनाओ से ही समझाजा सकता है।

Motivational Quotes

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