मुस्कुराने की वजह ना ढूंढे ...
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मुस्कुराने की वजह ना ढूंढे ...।
कई बार देखने मे आता है कि व्यक्ति अपने जीवन मे कभी मुस्कुराया ही नही, पता नही वो कब मुस्कुराया होगा, कहते है उसे दुःख है, कोई कहता है उसका स्वभाव ही ऐसा है, कोई कहता है उसके पास मुस्कुराने की वजह नही है, आदि।
क्या मुस्कुराने का संबंध दुःख से है ? क्या मुस्कुराने की भी कोई वजह होती होगी ? क्या मुस्कुराने का भी स्वभाव होता है ? शायद इन सभी सवालों का जबाब ना होगा।
मुस्कुराने का संबंध जीवन की नीरसता से है, नकारात्मक सोच से है। दुःख का संबंध तो मन व शरीर से होता है। जबकि मुस्कुराहट और आनंद तो अन्तरात्मा से होता है ये आत्मा का विषय है। यदि हम स्वयं सच्चे अर्थों में मानव बन जाएँ तो जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आएँगी ही नहीं। यदि हम कभी एकांत में शांतचित्त बैठकर चिंतन और मनन करें तो जीवन का लक्ष्य स्पष्ट रूप से सामने दिखाई देगा। अगर हम खुद से प्रेम करे और औरों में प्रेम बांटे तो आनंद की अनुभूति होगी, मन प्रसन्न होगा, और फिर मुस्कुराने से कोई रोक भी नही पायेगा। फिर ये दुनिया रंगीन लगेगी, इसमें कोई खर्च भी नही, सिर्फ मिलता ही है, और जिसे मिलता है वो सागर सा हो जाता है, सागर सिर्फ देता है, लेता कुछ नही।
सामान्यतया हम जो भौतिक जीवन जी रहे हैं, वह जीना जीवन नहीं है। जीवन जीना एक कला है। जो कि भौतिकता से हट कर है। जबकि आमजन इसी भौतिकता में मुस्कुराहट व आनंद ढूंढते रहते है, और आजीवन असफल रहते है।

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