संगत बदले रंगत


संगत बदले रंगत ...
अक्सर हम अपने आसपास के लोगों से सुनते आए है की संगति का असर हो कर ही रहता है। संगति अगर अच्छे लोगों से हो तो व्यक्ति में अच्छे गुण आयेंगे और अगर बुरे लोगों से हो तो व्यक्ति बुरे रास्तों की और प्रवृत्त होगा। किसी कक्षा में अध्ययन करने वाला छात्र अगर अनुतीर्ण होने वाले छात्रों के समूह में रहता है तो उस छात्र के भी वही हाल होंगे। इसीलिए कहा गया है की खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। कहने का तात्पर्य यह है की संगति का प्रभाव हो कर ही रहता है, यह बात अलग है की प्रभाव कितने समय में होगा और कितना होगा। कहते है अच्छी संगत से कल्याण और बुरी संगत से सत्यानाश तय है।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बहुत ही सटीक एवं सुन्दर चौपाई लिखी है;

"सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं। जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

अर्थात सुबुद्धि और कुबुद्धि सबके हृदय में रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदा रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ परिणाम में विपत्ति रहती है


"संगत बदले रंगत" का सरल अर्थ ये है की जब हम किसी नए दोस्त, स्थान या किसी ग्रुप में जाते है या मिलते है तो सामान्यतः हमारी सोच में, हमारे क्रिया कलाप में बदलाव आता है। जो की संगति का, वहां के वातावरण का प्रभाव होता है, जो की सामान्य रूप से अक्सर देखा जाता है। जब कोई व्यक्ति विद्वान, ईमानदार और मेहनती लोगों के साथ समय बिताता है, तो वह भी उन्हीं गुणों को अपने जीवन में उतारने लगता है, फलस्वरूप उसमे भी सकारात्मकता का संचार होता है।


"संगत बदले रंगत" का एक और गहरा अर्थ यह भी है कि संगति सिर्फ बाहरी गुणों को ही नहीं, बल्कि हमारे आंतरिक विचारों और भावनाओं को भी प्रभावित करती है। बुरी संगति या बुरे विचारों को सहजता के साथ, बिना किसी चिंतन के अपना लेते है जबकि अच्छे विचारों या चिंतन को आत्मसात करने के लिए को लंबे समय तक चिंतन करना पड़ता है।


हमे चाहिए की हमें सिर्फ सकारात्मक, आत्मविश्वास से भरपूर, प्रेरणादायक, दूर दृष्टि रखने वाले और उत्साही चिंतन और सोच के धनी लोगों के साथ के साथ ही दोस्ती रखना चाहिए, उनके समूह से ही सरोकार रखना चाहिए, उनसे मिलना-जुलना चाहिए, उनकी बातों को आत्मसात कर जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए, उनके पदचिन्हों पर चलाना चाहिए। हमें संगति का चुनाव सोच समझकर करना चाहिए इसी में हमारी, परिवार की और समाज की भलाई है।

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